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संस्कृत साहित्य में मानवाधिकार का स्वरूप

बीरपाल सिंह

Abstract


मानव अधिकारों की सुरक्षा, पहचान एवं उनका क्रियान्वयन बहुत महत्वपण्ूर् एव ं जटिल है क्योंक इसकी अवधारणा एव ं अर्थ म ें आम सहमति नही ं है। यह सामाजिक दशाओं े प्रभावित हाने वाली एक गतिशील अवधारणा है। ’’मानव अधिकार, आधारभूत अर्थ में वे मौलिक अधिकार हैं जो कि प्रत्येक व्यक्ति को राज्य या लोक प्राधिकार के द्वारा मानव होने के नाते प्राप्त होने चाहिए इस हेतु मानव के लिए मानव परिवार का सदस्य होना ही पर्याप्त है उसके लिए किसी अन्य शर्त की आवश्यकता नहीं है।‘‘2 प्राकृतिक काननू का अन्तिम तथ्य के रुप में आकर्षक सिद्धान्त यही है कि केवल नागरिक ही नही ं सभी व्यक्तियों की राज्य केदबाव से रक्षा की जानी चाहिए।’’3 ‘‘ वैदिक काल से ही मानवाधिकार संरक्षण होता आ रहा है।
व्यवहार में सामाजिक कल्याण का भाव सर्वोपरि था जो कि मानवाधिकार का मूल है। प्राचीन भारत में सनातन धर्म का विधान न केवल धार्मिक एवं नैतिक विधान था वरन् राजा के व्यवहारा,ें दण्ड विधानों को भी नियिं त्रत व संतुलित करता था। वह भी सामान्य नागरिक की भाँति काननू के प्रति उŸारदायी था। विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान सरं क्षण की पश्चिमी अवधारणा के भां त ये अवधारणा प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था के सचं ालन में कन्े द्रीय भाव रखती थी। धर्म-शास्त्रों में ही नही, नीति-शास्त्रों में भी राजा के कŸार्व् यों और दायित्वों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया जाता था ताकि राजा पथ-भ्रष्ट ना हो। राज्यों का स्वरूप राजतन्त्रात्मक होते हुये भी लाके तां त्रक प्रकृति लिए हुऐ था। भारतीय धर्म-शास्त्रां व नीति-शास्त्रों में प्राणी मात्र के प्रति दया की भावना का प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार मानवाधिकारों का भारतीय सदं र्भ व्यापक परिप्रक्ष्ेय लिये हुए है।

Keywords


Mitaksharaa, urbanization, women welfare, RDP, Social Status

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DOI: https://doi.org/10.21922/srjhsel.v6i26.11434